बाल मजदूरी, बाल अधिकार का समाजशास्त्रीय अध्ययन

(जिला: जाँजगीर-चाम्पा के विशेष संदर्भ में)

 

Dr.(Mrs.) Vrinda Sengupta1, Dr. Satish Agrawal2

1Asstt.Prof. (Sociology), Deptt.of Sociology, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

2Govt. College, Katagora (C.G.)

*Corresponding Author E-mail:

 

संक्षेपिका-

बाल्यकाल जीवन की बगियारूपी राष्ट्र की वह सुन्दर कली है, जिसे पुष्प के रूप में खिलकर राष्ट्र को महकाना है। इस अवस्था में मनुष्य की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का विकास होता है। बाल्यकाल में ही विकास की नींव रखी जाती है, क्योंकि आपका बालक ही भावी जीवन की पृष्ठभूमि तैयार करता है। महात्मा गाँधी के शब्दों में- बच्चे देश का भविष्य है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं और समाज तथा देश अपने बच्चों का जिस प्रकार पालन-पोषण करेगा, शिक्षा प्रदान करेगा, संस्कार देगा, वे बच्चे देश तथा समाज को उसी के अनुसार प्रतिफल देंगे, जिस आयु के बच्चों को स्कूल की बेंच पर बैठाकर अपना पाठ याद करना चाहिए तथा एक आदर्श नागरिक बनने हेतु सुसंस्कार ग्रहण करने चाहिए, उसी आयु में वे बच्चे होटल अथवा रेस्टारेंट की मेजों की गंदगी साफ करते हैं। गंदे बर्तनों को धोते हैं। कल-कारखानों में दूषित वायुमण्डल की खतरनाक मशीनों से जूझते हैं। इन्हीं बच्चों को बाल्यकाल में ही अपने जीवन को जीने के लिए दो जून की दो रोटी जुटाने के लिए सड़क पर आना पड़े तो आसानी से अंदाजा लगाया सकता है कि उस देश का भविष्य क्या होगा? जो दिन बच्चों के खेलने-कूदने तथा खाने-पीने के होते हैं। उन दिनों में बच्चांे को अपने परिवार तथा स्वयं के लिए रोटी जुटाने के लिए काम करना पड़ता है।

 

शब्द कुँजी: बाल मजदूरी, बालश्रम उन्मूलन, बाल अधिकार, बाल मानवाधिकार, पारिश्रमिक, गरीबी और भूखमरी

 

 

 

 

प्रस्तावना:

भारत में 1 करोड़ 25 लाख बाल श्रमिक हैं। इनकी

संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भारत में अभी भी 40 करोड़ से अधिक आबादीगरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। जब गरीबी रहेगी, भूखमरी होगी और गरीब लोगों के बच्चे बालश्रमिक बनने के लिए बाध्य रहेंगे, यह आर्थिक चक्र की विवशता है। गरीबी और मजबूरी के कारण गरीब माँ-बाप के बच्चे विभिन्न होटलों रेस्तराओं विभिन्न संस्थाओं और घरेलू कार्यों में सहायता पहुँचाते हैं। या रोजी-रोटी के लिए कार्य करते हैं। 14वर्ष से कम उम्र के बच्चांेे को नौकर रखना और असंवैधानिक और गैरकानूनी है। बालश्रमिक होना एक सामाजिक हकीकत है। बच्चों की जो उम्र शिक्षा प्राप्त करने की होती है। पढ़ाई-लिखाई की होती है। विवश होकर उन्हें जिन्दगी से जूझना पड़ता है और दुर्भाग्यजनक स्थिति में नौकर बनना पड़ता है।

 

 

भारत में लाखों की संख्या में आबादी विद्यमान है। इसमें हजारों ऐसे बच्चे मिलेंगे, जिनका पढ़ने-लिखने का समय नहीं होता है और कोई न कोई छोटा काम करते हैं, इसे दूसरे शब्दों में बाल मजदूरी या बालश्रम कहते हैं। भारत में लाखों ऐसे बच्चे है, जिनके माता-पिता अपने बच्चों पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते हैं। माता-पिता, अलग-अलग जगहों में मजदूरी या श्रम करते हैं और उनके छोटे-छोटे बच्चे मारे-मारे फिरते हैं। बालश्रम की समस्याएँ, चुनौतियाँ बनकर हमारे सामने खड़ी है। इसका समाधान खोजना समाजशास्त्रियों और सरकार का दायित्व बनता है।

 

बच्चे देश के भविष्य हैं, देश का विकास बच्चों के विकास की दिशा पर निर्भर करती है। फुटपाथ पर जीवन जीने वाले बच्चे अथवा कचरों की ढेर से कुछ तलाशते हुए बच्चों से बना आशा की जा सकती है। छ.. में बालश्रमिकों की संख्या 3.64 लाख है। आज अनाधिकृत आँकड़ों के अनुसार देश में बालश्रमिकों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक है। बालश्रम भारतीय समाज पर एक अभिशाप है। यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है, जब बालश्रमिक उन परिस्थितियों में कार्य करते हैं। जब बालश्रमिक उन परिस्थितियों में कार्य करते हैं, जो उनके स्वास्थ्य तथा भविष्य के लिए बेहद खतरनाक होती है। मजदूरी में मजदूरी करने में उनका बचपन गुजर जा रहा है। राज्य के प्रत्येक जिले में बालश्रमिक कार्यरत् हैं। बालश्रम की समस्याएँ, चुनौतियाँ पूर्ण तो है, किन्तु इसका समाधान असम्भव है, ऐसी बात नहीं है।

 

 

समाजशास्त्रीय महत्व:

बालश्रम समाज की एक ऐसी बुराई है, जिससे हम आजादी के 64 वर्ष के बाद भी छुटकारा नहीं पा सके। यह समस्या घटने के बजाय अपने पैर पसारते ही जा रही है। गाँवों से लेकर बस्तियाँ-शहरों में यह बालश्रम नाना प्रकार के उपक्रम करता हुआ हमें दिखाई देता है। खेत-खलिहान, बाग-बगीचों से लेकर सड़कों पर जूता-पाॅलिश करना, कूड़ा-करकट बीनता, कहीं कुछ सामान बेचता हुआ हमें दिखाई पड़ता है। भीषण गर्मी हो, बरसात में पानी हो या कड़ाके की ठण्ड में सड़क पर बाल श्रमिकों का काम कभी नहीं रूकता, अर्द्धरात्रि के बाद सिमट कर छोटे किए गए पैर, जिसमें घुटने पेट को स्पर्श करते हैं। एक फटा टाट का टुकड़ा और ओढ़ने के लिए सांत्वना स्वरूप चादर को ओढ़ फुटपाथ पर ऐसा पड़ा रहता है, मानो वह सुबह होने का इंतजार कर रहा हो, सुबह ब्रम्ह मुहूर्त में उठकर अपने सामान उठाकर या फटे बोरे लेकर निकल पड़ता है, फिर एक समय खाने की जुगाड़ में उसे सुबह उठकर ना तो मुँह धोने की फुर्सत मिलती है, ना ही चाय-पीने की तलब लगती है। वह तो बस अपना सामान उठाकर चल देता है और चलता ही जाता है।

 

यूनाइटेडनेशन ने 20 नवम्बर, 1959 की अपनी एक रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि बच्चे के शारीरिक तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक है कि बच्चे का विकास एक पारिवारिक माहौल में हो। परिवार स्वच्छ शांतिप्रिय तथा हँसी खुशी होना चाहिए,  लेकिन यह दुर्भाग्य है कि बच्चों को छोटी आयु में ही परिवारवालों द्वारा त्याग दिया जाता है। अति गरीबी, अत्यधिक जनसंख्या बेरोजगारी, सामाजिक मूल्यों का पतन तथा अशिक्षा इसके प्रमुख कारण है। ये सभी परिस्थितियाँ बच्चों को सड़क पर काम करने को विवश करती है। फिर ये बच्चे तो रोड पर रहकर अपना जीवन-यापन करते हों।

 

उद्देश्य:

1. के कौन-से कारण हैं, जो बच्चों को इस प्रकार का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं।

2. इनकी पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि किस प्रकार की है।

3. क्या सरकार द्वारा इनकी स्थिति में सुधार का प्रयास किया गया है।

 

 

परिकल्पनाएँ:

ऽ  असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकाँशतः श्रमिक निम्न वर्ग के हैं। उनकी सामाजिक-आर्थिक दशा में सुधार लाना होगा।

ऽ  अधिकाँशतः बाल श्रमिक निरक्षर/अशिक्षित परिवार से संबंधित है। उनकी शिक्षा के प्रति जागृति लाना।

ऽ  जनाधिक्य की समस्या पर नियंत्रण।

ऽ  बाल सम्पे्रषण गृह में अनाथ बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करना।

ऽ  बालकों को उनके अधिकार के संबध में जागृति लाने का प्रयास करना।

 

अध्ययन पद्धति:

शोध कार्य के लिए प्राथमिक एवं द्वैतियक सामग्रियों का संग्रहण किया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र:

भोजपुर (चाम्पा) विद्यालय का एक वार्ड को चुना गया है। यह औद्योगिक प्रतिष्ठान स्पंज आयरन लिमिटेड, चाम्पा के निकट है। विद्यालय की स्थापना भोजपुर में किया गया है, वैसे अधिकाँश स्कूलों का संचालन एन.जी.. के हाथों में हैं, लेकिन भोजपुर विद्यालय का सीधा नियंत्रण परियोजना कार्यालय के पास है।

 

समाधान एवं निवारण:

गाँव के विकास में ही भारत का विकास सम्पूर्ण होगा। गाँवों की बचपन को सही दिशा में ले जाना होगा। सही दिशा में उनका मार्गदर्शन करना होगा, क्योंकि बच्चे ही कल के भविष्य होते और चिंतक हैं। वे ही हमारे फौजी बनेंगे और देश की रक्षा करेंगे। उन्हें शिक्षित बनाकर देश को आलोकित करने के लिए पे्ररित करना होगा।

 

भारत में मानव शक्ति की कमी नहीं है। बालश्रमिकों को मुक्ति दिलाई जानी चाहिए, क्योंकि उन्हें हमें शिक्षित करना है। उन्हें कल का भविष्य बनाना है, यह तभी संभव है, जब हम बालश्रम खत्म करने का प्रयास करेंगे, परन्तु यह एक कठिन समस्या है, इसे आसानी से दूर नहीं किया जा सकता। बाल श्रमिकों की संख्या घटने के बजाए दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, यह एक भयानक स्थिति है। इस समस्या का समाधान कैसे होगा। इस कठिन समस्या का घर, समाजशास्त्रियों को चिंतन, मनन करना चाहिए। बालश्रमिकों की संख्या कम करने के लिए कानूनी स्तर पर बहुत प्रयास किए गए हैं, परन्तु इसका कोई समाधान अब तक नहीं निकाला जा चुका है। यह हमारे देश के संविधान के लिए एक चुनौतीपूर्ण बात है।

 

निष्कर्ष:

जिस देश का बचपन भूखा है, उस देश की जवानी क्या होगी।

 

हँसता बचपन ही हँसता राष्ट्र दे सकता है। बच्चे राष्ट्र के भविष्य है और विकास की मजबूत ईंटें है। यदि बचपन को ईश्वर की अनमोल सौगात मानते हुए उसे विकास का मौका दिया जाये तो उसके नतीजे हमें वैसे ही प्राप्त होंगे जो पश्चिमी देशों के है। अक्षर ज्ञान से वंचित बच्चे कल्पना पर नहीं पहुँच सकते। भविष्य का चीज जिस प्रकार वर्तमान के गर्भ में पलेगा, कल ही परिणति उसी रूप में होगी। यदि देश को उन्नति और विकास के मार्ग में ले जाना है तो हमें बचपन को काम के अँधेरे कुएँ में जाने से रोकना होगा, क्योंकि इस समस्या के निदान के लिए यह वंचित एवं अपेक्षित मात एक टकटकी लगाए समाज से लगातार अपने प्रश्न का उŸार चाहती है- पूछती है झोपड़ी और पूछते हैं लोग भी कब तक लूटते रहेंगे, लोग मेरे गाँव के।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:

1. आहूजा, राम (2006): सामाजिक समस्याएँ, रावत पब्लिकेशन्स, जयपुर एवं नई दिल्ली।

2. दीक्षित, धु्रव कुमार (2002): बाल श्रम उन्मूलन एक चुनौती’, जयपुर पाइंटर पब्लिशर्स।

3. डी.एस.वोल्फे (1987) चाइल्ड एवस’, सेज पब्लिकेशन, बावर्लि होल्स।

4. वोल्ट्स, एस.आर.: वर्किन वीथ वाइलेंट फैमिली’, सेज पब्लिेकेशन, न्यूयार्क।

5. योजना (मई, नवम्बर 2008), नई दिल्ली।

6. श्रम मंत्रालय, भारत सरकार के वेबसाइट।

 

 

Received on 05.11.2015       Modified on 21.11.2015

Accepted on 20.12.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 3(4): Oct. - Dec., 2015; Page 183-186